
दस महाविद्याओं में तारा महाविद्या (Tara Mahavidya) को द्वितीय विद्या के रूप में जाना जाता है। यह माँ सती के 10 रूपों में से दूसरा रूप थी। माँ तारा का रूप माँ काली के समकक्ष कहा जा सकता है जिस कारण यह काली कुल में आती हैं। माँ का यह रूप भक्तों को आर्थिक क्षेत्र में उन्नति व जीवन में मोक्ष प्रदान कराने वाला है।
माँ तारा रहस्य पूर्ण हैं जिसमें सबसे बड़ा एक रहस्य इन्हें शिवजी की माँ की उपाधि मिलना है। वह इसलिए क्योंकि माँ तारा माता सती का ही एक रूप हैं। माता सती भगवान शिव की पत्नी हैं तो माँ तारा शिवजी की माँ कैसे हो गई।
Tara Mahavidya | तारा महाविद्या
तारा माता की दो कथाएं प्रचलित हैं। इसमें से एक कथा उनकी उत्पत्ति और महाविद्या बनने को दिखाती है तो दूसरी माँ तारा का रहस्य खोलती है। हालाँकि माँ तारा दिखने में बहुत ही भयानक हैं। इसी कारण इन्हें काली कुल की माता कहा जाता है। बहुत लोग तो माँ तारा को ही काली समझ लेते हैं। ऐसे में आज हम दोनों के बीच के मूलभूत अंतर को भी आपके सामने रखेंगे।
तारा देवी की कथा | Das Mahavidya Tara
मां तारा देवी की उत्पत्ति से जुड़ी एक और पौराणिक कथा प्रचलित है. जिसके अनुसार, मां तारा देवी का जन्म मेरु पर्वत के पश्चिम भाग में चोलना नदी के किनारे पर हुआ था. हयग्रीव नाम के एक दैत्य का वध करने हेतु मां महाकाली ने नील वर्ण धारण किया था. महाकाल संहिता के अनुसार, चैत्र शुक्ल अष्टमी को देवी तारा प्रकट हुई थीं इसलिए यह तिथि तारा-अष्टमी कहलाती हैं और चैत्र शुक्ल नवमी की रात्रि को तारा-रात्रि कहा जाता है.
ऐसी मान्यता है कि भगवान शिव जी ने मां पार्वती को बताया कि आदि काल में आपने भयंकर मुख वाले रावण का विनाश किया, तब से आपका यह स्वरूप तारा नाम से जाना जाता है. उस समय सभी देवताओं ने आपकी स्तुति की थी. आप अपने हाथों में खड़ग, नर मुंड, वार तथा अभय मुद्रा धारण की हुई थी. मुख से चंचल जिह्वा बाहर कर आपने भयंकर रूप धारण किया था. आपका वह विकराल रूप देख सभी देवता भयभीत होकर कांप रहे थे. आपके विकराल भयंकर रुद्र रूप को देखकर शांत करने के लिए ब्रह्मा जी आपके पास गए थे.
रावण वध के समय आप अपने रौद्र रूप के कारण नग्न हो गई थी तथा स्वयं ब्रह्मा जी ने आपकी लज्जा निवारण हेतु आपको व्याघ्र चर्म प्रदान किया था. इसी रूप में देवी लम्बोदरी के नाम से विख्यात हुई. तारा-रहस्य तंत्र के अनुसार, भगवान राम निमित मात्र ही थे. वास्तव में भगवान राम की विध्वंसक शक्ति देवी तारा ही थी, जिन्होंने लंका पति रावण का वध किया था.
माँ तारा रहस्य
माँ तारा से एक मार्मिक कथा जुड़ी हुई है जो उनके मातृत्व भाव को दर्शाती है। यह कथा समुंद्र मंथन के समय से जुड़ी हुई है। सतयुग में देव-दानवों के बीच जब समुंद्र मंथन का कार्य चल रहा था तब उसमें से अथाह मात्रा में विष निकला था। तब सृष्टि को उस विष के प्रभाव से बचाने के उद्देश्य से भगवान शिव ने उसे पी लिया था।
उस विष का प्रभाव इतना ज्यादा था कि भगवान शिव की आँखों के आगे अँधेरा छाने लगा। वे मूर्छित होने ही वाले थे कि देवी दुर्गा ने माँ तारा का रूप धरा और भगवान शिव की माँ के रूप में उन्हें स्तनपान करवाया। माँ तारा के द्वारा स्तनपान कराए जाने के कारण भगवान शिव के ऊपर विष का प्रभाव कम हुआ और वे पुनः चेतना अवस्था में आ गए।
तारा महाविद्या के इस कृत्य से उनका महत्व अत्यधिक बढ़ गया था तथा उन्हें भगवान शिव की माँ की उपाधि मिली थी। इस कारण भक्तगण माँ तारा को मातृत्व भाव से देखते हैं और उसी रूप में उनकी साधना (Tara Sadhna) करते हैं।
तारा महाविद्या का रूप (Mahavidya Tara Devi Ka Roop)
माँ काली व माँ तारा के रूप में कई समानताएं हैं लेकिन कुछ चीज़े हैं जो दोनों को अलग रूप प्रदान करती हैं। माँ तारा का वर्ण नीला हैं जिस कारण इनका एक नाम नील सरस्वती भी हैं। इनके सिर पर एक मुकुट हैं जिस पर अर्ध चंद्रमा हैं और केश खुले व बिखरे हुए हैं।
मुख थोड़ा सा खुला हुआ व आश्चर्यचकित मुद्रा में हैं। माँ खुले मुख से हँसते हुए भी दिखाई दे रही हैं। गले में भगवान शिव की भांति सर्प लपेटे हुए है। माँ के चार हाथ हैं जिनमें से एक में खड्ग, दूसरे में तलवार, तीसरे में कमल का फूल व चौथे में कैंची पकड़ी हुई हैं।
माँ के कुछ भिन्न रूपों में उनके एक हाथ में तलवार की बजाए कटोरा पकड़े हुए दिखाया गया हैं। कुछ में उनकी जीभ थोड़ी सी बाहर निकली हुई दिखाई गयी हैं जिसमें से रक्त बह रहा हैं तो कुछ में उनके हाथ में राक्षस की खोपड़ी भी पकड़ायी गयी हैं।
माँ के गले में राक्षसों के कटे हुए सिर की माला हैं तो नीचे वस्त्र के रूप में बाघ की खाल लपेटे हुए हैं। माँ का यह रूप भीषण होने के साथ-साथ अपने भक्तों को अभय प्रदान करने वाला हैं।
महाविद्या काली व तारा में अंतर
दोनों के रूप में बहुत सी समानताएं होने के कारण भक्तगण माँ तारा को माँ काली समझ बैठते हैं। इसलिए आज हम आपको दोनों के रूप में भिन्नता बताएँगे।
- माँ काली का रंग काला है जबकि माँ तारा का रंग नीला है।
- माँ काली नग्न अवस्था में हैं जबकि माँ तारा बाघ की खाल लपेटे हुए हैं।
- माँ काली की जीभ निकली हुई है जबकि माँ तारा का मुख हल्का खुला हुआ है।
- माँ काली के सिर पर कुछ नहीं है जबकि माँ तारा सिर पर अर्ध चंद्रमा के साथ मुकुट धारण किए हुए है।
- माँ काली के गले में केवल राक्षस खोपड़ियों की माला है जबकि माँ तारा के गले में सर्प भी है।
- माँ काली के हाथ में राक्षस की खोपड़ी, खड्ग व कटोरा है जबकि माँ तारा के साथ में खड्ग, तलवार, कैंची व कमल का फूल है।
इस तरह से तारा महाविद्या कई चीज़ों में काली से भिन्न होती है। शुरूआती तौर पर या जिन्हें माँ तारा के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं होती है, वे अवश्य ही उन्हें काली समझ सकते हैं। हालाँकि अब से आपको दोनों के बीच मूलभूत अंतर का ज्ञान हो गया है।
माँ तारा पूजा विधि
माँ तारा की पूजा या साधना मुख्यतया तांत्रिकों द्वारा तंत्र व शक्ति विद्या प्राप्त करने के लिए की जाती है। इनकी साधना का समय मध्यरात्रि काल का होता है। सामान्य भक्तगण माँ तारा की पूजा अन्य माताओं की तरह सामान्य रूप से कर सकते हैं। इसके लिए माँ के किसी भी रूप को सामने रखकर बस मन में तारा देवी के रूप का ध्यान कर माँ तारा के मूल मंत्र का जाप करें।
ऐसा करने से ही देवी तारा अपने भक्तों से प्रसन्न होती हैं और उन्हें आशीर्वाद प्रदान करती हैं। देवी तारा महाविद्या की पूजा मुख्य रूप से गुप्त नवरात्रों में की जाती है। गुप्त नवरात्रों में मातारानी की 10 महाविद्याओं की ही पूजा की जाती है जिसमें दूसरे दिन महाविद्या तारा की पूजा करने का विधान है। इसलिए यदि आप तारा माँ का आशीर्वाद पाना चाहते हैं और उनकी शक्तियां प्राप्त करना चाहते हैं तो गुप्त नवरात्रि के दूसरे दिन उनकी पूजा करें।
माँ तारा मंत्र | Tara Mahavidya Mantra
ॐ ह्रीं स्त्रीं हुं फट्॥
माँ तारा के मंत्र का जाप किसी को दिखाकर या जोर-जोर से नहीं किया जाता है। यह गुप्त रूप से जपा जाने वाला मंत्र होता है। एक तरह से तारा माता की पूजा किसी को दिखाकर नहीं बल्कि अपने घर में गुप्त रूप से की जाती है। ऐसे में इस मंत्र का जाप भी मन ही मन में या धीरे आवाज में किया जाता है।
Tara Sadhna | तारा साधना अनुभव लाभ सहित
माँ तारा का यह रूप अवश्य ही आपको भयंकर व डरावना लग सकता है लेकिन है बिल्कुल इसके विपरीत। माँ तारा अपने भक्तों को इस भौतिक व सांसारिक दुनिया से पार लगाती हैं या तारती हैं जिस कारण इनका नाम तारा पड़ा। हम सभी ईश्वर को तारणहार कहते हैं अर्थात हम सभी का उद्धार करने वाला। वही कार्य मातारानी का यह रूप करता है।
माँ तारा की साधना करने से भक्तों को ना केवल मोक्ष प्राप्त होता है बल्कि आर्थिक क्षेत्र में भी उन्नति देखने को मिलती है। यदि किसी कारणवश आप अपने व्यापार या नौकरी में उन्नति को लेकर संतुष्ट नही हैं तो निश्चय ही आपको Tara Mahavidya की आराधना करनी चाहिए। इससे आर्थिक दृष्टि से प्रगति देखने को मिलेगी।
माँ तारा से संबंधित जानकारी
- माँ तारा से संबंधित रुद्रावतार तारकेश्वर महादेव हैं।
- माँ सती के 51 शक्ति पीठों में से एक शक्तिपीठ पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले में है जिसे तारापीठ के नाम से जाना जाता है। यहाँ देवी सती के नयन/ आँखें गिरी थी जिस कारण माँ तारा को नयनतारा के नाम से भी जाना जाता है।
- माँ तारा का एक और प्रसिद्ध मंदिर हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला में है।
- माँ तारा के अन्य नाम एकजटा, नील सरस्वती, नयनतारा व उग्रतारा है।
- त्रेतायुग में भगवान श्रीराम के राजगुरु महर्षि वशिष्ठ थे। उनके द्वारा माँ तारा की पूजा-अर्चना कर सिद्धियाँ प्राप्त की गई थी। महर्षि वशिष्ठ ने पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले में तारापीठ में माँ तारा की साधना की थी और सिद्धियों को अर्जित किया था।
- देवी तारा की केवल हिंदू धर्म में ही नहीं अपितु बौद्ध धर्म में भी मान्यता है। मुख्यतया तिब्बती बौद्ध लोगों के बीच माँ तारा अत्यधिक प्रसिद्ध हैं। वहां इन्हें सरंक्षण प्रदान करने वाली व अपने भक्तों का उद्धार करने वाली माता के रूप में पूजा जाता है। कहीं-कहीं महात्मा बुद्ध को भी माँ तारा के रूप में चित्रित किया गया है।
⚠️ चेतावनी ⚠️
बिना गुरु संरक्षण के कोई भी साधना नहीं करनी चाहिए।
अज्ञानता में की गई साधना मानसिक, शारीरिक और आध्यात्मिक हानि पहुँचा सकती है।
सही मार्गदर्शन और अनुभवी गुरु के निर्देशन में ही साधना करना सुरक्षित और फलदायी होता है।
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