
माँ सती की दस महाविद्याओं में से छिन्नमस्ता देवी (Chinnamasta Devi) छठी महाविद्या हैं जिनका रूप अत्यंत भीषण व डराने वाला है। माता छिन्नमस्ता इस रूप में अपने एक हाथ में किसी राक्षस का सिर नहीं बल्कि अपना ही कटा हुआ सिर पकड़े हुए रहती हैं। साथ ही उनकी गर्दन में से रक्त की तीन धाराएँ निकल रही होती हैं। ऐसे में उन्हें छिन्नमस्तिका माता के नाम से भी जाना जाता है।
Chinnamasta Devi | छिन्नमस्ता देवी
वैसे तो मातारानी के कई रूप हैं। सामान्य नवरात्र में उनके 9 रूपों की पूजा की जाती है तो वहीं गुप्त नवरात्रों में उनके 10 महाविद्या रूप की पूजा की जाती है। इसी के साथ ही समय-समय पर मातारानी ने अपने कई रूप लिए हैं। इसमें से कुछ सौम्य हैं तो कई भयंकर दिखने वाले। माँ काली का रूप अत्यधिक भीषण व उग्र माना जाता है किन्तु माँ छिन्नमस्ता का रूप तो और भी आतंकित करने वाला है।
अपने इसी रूप के कारण ही सभी महाविद्याओं में छिन्नमस्ता महाविद्या (Chinnamasta Mahavidya) सभी के बीच प्रचलित हो गई हैं। जगह-जगह छिन्नमस्ता माता के मंदिर खोले गए हैं। वहां हर दिन लाखों लोग अपना माथा टेकने आते हैं।
छिन्नमस्तिका माता की कहानी
माता छिन्नमस्ता काली का एक बहुत ही विकराल स्वरूप हैं। हालांकि, इन्हें जीवनदायिनी माना जाता है।छिन्नमस्ता देवी अपने मस्तक को अपने ही हाथों से काट कर, अपने हाथों में धारण करती हैं। इस देवी की उत्पत्ति कैसे हुई और इनका स्वरूप ऐसा क्यों है, इससे जुड़ी एक बहुत ही दिलचस्प कथा है। मार्कण्डेय पुराण और शिव पुराण के अनुसार, जब देवी ने चण्डी का रूप धरकर राक्षसों का संहार किया था, तो चारों ओर उनका जय घोष होने लगा। परन्तु देवी की सहायक योगिनियाँ जया और विजया की खून की प्यास शान्त नहीं हो पाई थी। इस पर उनकी रक्त पिपासा को शान्त करने के लिए माँ ने अपना मस्तक काटकर अपने रक्त से उनकी रक्त प्यास बुझाई। इस कारण माता को छिन्नमस्तिका नाम से पुकारा जाने लगा। छिन्नमस्तिका देवी को तन्त्र शास्त्र में प्रचण्ड चण्डिका और चिन्तापूर्णी माता जी भी कहा जाता है।
मां छिन्नमस्ता की उत्पत्ति की दूसरी कथा पुराणों और तंत्र ग्रंथों में वर्णित है। यह कथा मां पार्वती के एक उग्र अवतार से जुड़ी है, जो आत्म-बलिदान और भक्ति की पराकाष्ठा को दर्शाती है। एक बार की बात है, मां भगवती (पार्वती) अपनी दो सहचरियों जया और विजया के साथ हिमालय की मंदाकिनी नदी में स्नान कर रही थीं। स्नान के दौरान समय बीतता गया और सहचरियों को तीव्र भूख लगने लगी। वे मां पार्वती से बोलीं, “मां, हमें भूख लगी है, कृपया हमें भोजन प्रदान करें।” मां पार्वती ने उन्हें धैर्य रखने को कहा, लेकिन सहचरियों की भूख बढ़ती गई। अंत में, उन्होंने फिर से अनुरोध किया, “मां, हमें भोजन दो।”
उस समय आसपास कोई भोजन उपलब्ध नहीं था। मां पार्वती ने अपनी सहचरियों की भूख शांत करने के लिए एक अद्भुत निर्णय लिया। उन्होंने अपनी खड्ग से अपना ही सिर काट लिया। कटे हुए सिर को अपने बाएं हाथ में धारण कर लिया। गर्दन से निकलने वाली रक्त की तीन धाराएं बनीं। इनमें से एक धारा स्वयं मां के मुंह में गई, जिससे वे खुद को तृप्त कर रही थीं। शेष दो धाराएं जया और विजया के मुंह में गईं, जिससे उनकी भूख शांत हुई। इस रूप में मां छिन्नमस्ता का प्रादुर्भाव हुआ। जया और विजया को क्रमशः डाकिनी और वारिणी के नाम से जाना जाने लगा।
छिन्नमस्ता का अर्थ
छिन्नमस्ता शब्द दो शब्दों के मेल से बना है जिसमें से छिन्न का अर्थ अलग होने से है जबकि मस्ता का अर्थ मस्तक या सिर से है। इस प्रकार छिन्नमस्ता का मतलब जिसका मस्तक अपने धड़ से अलग हो गया हो।
माता पार्वती या सती ने Chinnamasta Devi के अपने इस रूप में इसी का ही प्रदर्शन किया है। इस कारण उनके इस रूप का नाम छिन्नमस्ता पड़ गया था। कुछ लोगों के द्वारा इसे छिन्नमस्तिका माता भी कह दिया जाता है।
छिन्नमस्ता देवी का स्वरुप
छिन्नमस्ता माता का स्वरुप अत्यंत ही भीषण है। यह माँ का उग्र रूप है, इसलिए उनके इस रूप को प्रचंड चंडिका भी कहा जाता है। माँ अपने अन्य उग्र रूपों में राक्षसों की कटी खोपड़ी हाथ में लिए रहती हैं जबकि इस रूप में उनके एक हाथ में स्वयं उनकी ही खोपड़ी रहती है।
माँ एक मैथुन करते हुए जोड़े के ऊपर खड़ी हैं। उनका वर्ण गुड़हल के समान लाल है तथा वस्त्रों के रूप में उन्होंने केवल आभूषण पहने हुए हैं। उनका सिर कटा हुआ है तथा धड़ में से रक्त की तीन धाराएँ निकल रही हैं। उनके आसपास उनकी दो सेविकाएँ खड़ी हैं। रक्त की दो धाराएँ दोनों सेविकाओं के मुहं में जा रही हैं जबकि एक धारा उनके स्वयं के मुख में जा रही है।
गले में उन्होंने राक्षस की खोपड़ियों की माला पहनी हुई है। कटे हुए सिर पर उन्होंने एक मुकुट पहना हुआ है जिसके तीन नेत्र हैं। माँ के दो हाथ हैं जिनमें से एक में खड्ग तथा दूसरे में अपना ही कटा हुआ सिर पकड़ा हुआ है। Maa Chinnamasta ने कमरबंद के रूप में भी राक्षस की खोपड़ियों को बांधा हुआ है।
छिन्नमस्ता देवी मंत्र
श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं वज्र वैरोचनीयै हूं हूं फट् स्वाहा॥
मातारानी का यह रूप मन को आतंकित अवश्य करता है लेकिन इस रूप के जरिए मातारानी यह दिखा रही हैं कि वे सच्चे भक्तों की इच्छाओं को पूरा करने के लिए किस हद्द तक जा सकती हैं। ऐसे में यदि आप भी Chinmastika Mata की कृपा पाना चाहते हैं तो आपको सच्चे मन के साथ छिन्नमस्ता देवी मंत्र का जाप करना चाहिए। इससे जल्द ही मातारानी आपसे प्रसन्न होंगी और आपकी विपत्तियों का नाश करेंगी।
माँ छिन्नमस्ता पूजा विधि
यदि आप छिन्नमस्तिका माता को प्रसन्न करना चाहते हैं तो उसके लिए विधिपूर्वक उनके मंत्र का जाप करना चाहिए। इसके लिए आपको नहा-धोकर, मातारानी की मूर्ति या चित्र के सामने आसन लगाकर बैठना चाहिए। यदि घर पर माँ छिन्नमस्ता का चित्र नहीं भी है तो आप माँ दुर्गा या माता पार्वती के चित्र के सामने भी आसन लगाकर बैठ सकते हैं।
अब आपको Maa Chinnamasta के सामने ज्योत प्रज्ज्वलित करनी चाहिए और उनका ध्यान करना चाहिए। फिर ऊपर हमने आपको जो छिन्नमस्ता देवी मंत्र बताया है, उसका जाप करना चाहिए। इस मंत्र का जाप आप अपनी इच्छा अनुसार कितनी भी बार कर सकते हैं। फिर अंत में मातारानी की ज्योत लेकर उसे पूरे घर में घुमाना चाहिए। इससे आपको जल्द ही लाभ मिलेगा।
छिन्नमस्ता पावर व पूजा लाभ
माँ छिन्नमस्ता के रूप व स्वभाव को देखते हुए इनकी पूजा तांत्रिकों द्वारा तंत्र व शक्ति विद्या अर्जित करने व अपने शत्रुओं का नाश करने के उद्देश्य से की जाती है। आम भक्तों को केवल इनकी उपासना करने की सलाह दी जाती है ना कि विशेष रूप से पूजा या साधना की।
तांत्रिकों व साधुओं के द्वारा माँ छिन्नमस्ता की पूजा अपने शत्रुओं का समूल नाश, भय को दूर करने व विपत्तियों को समाप्त करने के लिए की जाती है। माँ छिन्नमस्ता की कृपा से भक्तों पर आई विपत्ति व संकट दूर होते हैं तथा उनका मार्ग प्रशस्त होता है।
माता छिन्नमस्ता महाविद्या की पूजा मुख्य रूप से गुप्त नवरात्रों में की जाती है। गुप्त नवरात्रों में मातारानी की 10 महाविद्याओं की ही पूजा की जाती है जिसमें से छठे दिन महाविद्या छिन्नमस्ता की पूजा करने का विधान है।
Chinmastika Mata से संबंधित जानकारी
- छिन्नमस्ता माता का अन्य नाम छिन्नमस्तिका, प्रचंड चंडिका, स्वयंभू देवी व चिंतपूर्णी माता है।
- छिन्नमस्ता देवी का शक्तिपीठ रांची राज्य के झारखंड में स्थित है।
- छिन्नमस्ता देवी से संबंधित रुद्रावतार दमोदेश्वर महादेव हैं।
⚠️ चेतावनी ⚠️
बिना गुरु संरक्षण के कोई भी साधना नहीं करनी चाहिए।
अज्ञानता में की गई साधना मानसिक, शारीरिक और आध्यात्मिक हानि पहुँचा सकती है।
सही मार्गदर्शन और अनुभवी गुरु के निर्देशन में ही साधना करना सुरक्षित और फलदायी होता है।
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