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पुत्रजीव (पुत्रंजीवक) माला (Putrajiv (Putranjivak) Mala) सौरभ आचार्य गुरुजी

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पुत्रजीव (पुत्रंजीवक) माला (Putrajiv (Putranjivak) Mala) सौरभ आचार्य गुरुजी

 

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पुत्रजीव (पुत्रंजीवक) माला

पुत्रजीव माला पुत्रंजीव (Putranjiva roxburghii) वृक्ष के कठोर बीजों से बनाई जाती है। इसे संस्कृत में पुत्रजीव, पुत्रजीवक, सुतजीवक, गर्भद, अपत्यजीव आदि नामों से जाना गया है। आयुर्वेद, तांत्रिक परंपरा तथा कुछ शैव ग्रंथों में इसका उल्लेख मिलता है।

 उत्पत्ति

  • पुत्रजीव एक सदाबहार वृक्ष है जो भारत, नेपाल, श्रीलंका तथा दक्षिण-पूर्व एशिया में पाया जाता है।
  • इसके बीज अत्यंत कठोर होते हैं, जिनसे जपमाला बनाई जाती है।
  • आयुर्वेद में इसके बीज, पत्ते, फल एवं छाल का औषधीय उपयोग भी वर्णित है।

 शास्त्रों में महत्व

कक्षपुट तंत्र में उल्लेख मिलता है कि पुत्रजीव के बीजों की माला सभी प्रकार की मंत्र-साधनाओं में उपयोग की जा सकती है।

आयुर्वेदिक ग्रंथों में इसे गर्भ की रक्षा, स्त्री-प्रजनन स्वास्थ्य तथा बलवर्धन से जोड़ा गया है, किन्तु शास्त्रों में यह कहीं भी निश्चित रूप से पुत्र (लड़का) प्राप्त कराने वाली वस्तु नहीं कही गई है। यह धारणा मुख्यतः लोकविश्वास में विकसित हुई है।


 पुत्रजीव माला से किन देवी-देवताओं का जप कर सकते हैं?

पुत्रजीव माला सात्त्विक एवं कल्याणकारी मानी जाती है। इससे निम्न देवताओं के मंत्रों का जप किया जा सकता है—

  • भगवान शिव
  • माता पार्वती
  • श्री विष्णु
  • श्री लक्ष्मी
  • श्रीकृष्ण
  • श्रीराम
  • श्रीहनुमान
  • श्रीगणेश
  • भगवान दत्तात्रेय
  • भगवान सूर्य
  • भगवान कार्तिकेय
  • संतति गोपाल
  • बाल गोपाल
  • दुर्गा
  • गौरी
  • सरस्वती
  • नवग्रह मंत्र
  • महामृत्युंजय मंत्र
  • गायत्री मंत्र
  • शिव पंचाक्षरी
  • विष्णु सहस्रनाम
  • श्रीसूक्त
  • पुरुषसूक्त

तांत्रिक परंपरा में भी सामान्य सात्त्विक मंत्र-साधना के लिए इसका प्रयोग स्वीकार किया गया है।


 किन मंत्रों में इसका विशेष महत्व माना जाता है?

  • ॐ नमः शिवाय
  • ॐ त्र्यम्बकं यजामहे…
  • ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
  • ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः
  • गायत्री मंत्र
  • संतति गोपाल मंत्र
  • शिव-पार्वती उपासना
  • गौरी मंत्र
  • श्रीराम मंत्र
  • श्रीकृष्ण मंत्र

 पुत्रजीव माला के पारंपरिक लाभ

परंपरागत मान्यताओं के अनुसार—

  • संतान प्राप्ति की कामना में उपयोग।
  • गर्भस्थ शिशु की मंगलकामना।
  • गर्भधारण के लिए प्रार्थना एवं आध्यात्मिक साधना।
  • परिवार में सुख-शांति।
  • मानसिक स्थिरता।
  • सकारात्मक ऊर्जा।
  • सात्त्विक साधना में एकाग्रता।
  • शिव एवं विष्णु भक्ति में उपयोग।
  • बालकों की रक्षा हेतु ताबीज या माला के रूप में पहनने की लोकपरंपरा।

 धारण करने की विधि

  • सोमवार, गुरुवार, पुष्य, गुरु पुष्य, रवि पुष्य अथवा शुभ मुहूर्त में धारण करें।
  • गंगाजल से शुद्ध करें।
  • कच्चे दूध एवं स्वच्छ जल से अभिषेक कर सकते हैं।
  • शिवलिंग या भगवान विष्णु के चरणों में अर्पित करें।
  • धूप-दीप दिखाएँ।
  • कम से कम 108 बार अपने इष्ट मंत्र का जप करें।
  • श्रद्धापूर्वक गले या हाथ में धारण करें।

 जप के नियम

  • माला को स्वच्छ रखें।
  • जप के समय गोमुखी का प्रयोग करना श्रेष्ठ माना जाता है।
  • मेरु (गुरु) मनके को पार न करें।
  • जप के बाद माला को सम्मानपूर्वक सुरक्षित रखें।
  • दूसरों को अपनी जपमाला प्रयोग हेतु न दें।

 सावधानियाँ

  • माला को अपवित्र स्थान पर न रखें।
  • क्रोध, नशा या अत्यधिक अशुद्ध अवस्था में जप से बचें।
  • जपमाला का उपयोग केवल साधना के लिए करें।
  • माला टूट जाए तो पुनः शुद्ध करके पिरो सकते हैं।
  • समय-समय पर गंगाजल से शुद्धि करें।

 आयुर्वेदिक महत्व

आयुर्वेद में पुत्रजीवक के विभिन्न भागों का उपयोग पारंपरिक रूप से निम्न उद्देश्यों के लिए वर्णित है—

  • स्त्री प्रजनन स्वास्थ्य
  • गर्भधारण में सहयोग (पारंपरिक संदर्भ)
  • गर्भधारण की स्थिरता
  • वात-पित्त संबंधी कुछ विकार
  • ज्वर
  • सूजन
  • त्वचा संबंधी समस्याएँ
  • मूत्र संबंधी विकार

इन उपयोगों के लिए स्व-उपचार नहीं करना चाहिए; योग्य आयुर्वेदाचार्य की सलाह आवश्यक है।


निष्कर्ष

पुत्रजीव माला एक प्राचीन सात्त्विक जपमाला है, जिसका उपयोग शिव, विष्णु, गायत्री, महामृत्युंजय, संतति गोपाल तथा अनेक वैदिक एवं पौराणिक मंत्रों के जप में किया जा सकता है। आयुर्वेद और लोकपरंपरा में इसे गर्भ-सुरक्षा, संतान-कल्याण एवं परिवार की मंगलकामना से जोड़ा गया है, परन्तु इसे पुत्र-प्राप्ति का निश्चित साधन मानना शास्त्रीय और वैज्ञानिक दृष्टि से उचित नहीं है।

 

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