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अष्टमुखी रुद्राक्ष (Eight Mukhi Rudraksha)
अष्टमुखी रुद्राक्ष को भगवान श्रीगणेश का दिव्य स्वरूप माना गया है। अनेक शैव ग्रंथों, विशेषकर शिवपुराण (रुद्राक्ष महात्म्य), पद्मपुराण, देवीभागवत, रुद्राक्ष जाबाल उपनिषद् तथा पारंपरिक रुद्राक्ष ग्रंथों में अष्टमुखी रुद्राक्ष का विशेष महत्व बताया गया है। यह रुद्राक्ष विघ्नों का नाश करने, बुद्धि, सफलता, आत्मविश्वास तथा आध्यात्मिक उन्नति प्रदान करने वाला माना जाता है।
अष्टमुखी रुद्राक्ष की उत्पत्ति
शिवपुराण के अनुसार भगवान शिव ने समस्त प्राणियों के कल्याण के लिए तप किया। तप समाप्त होने पर जब उन्होंने अपने नेत्र खोले, तब उनके करुणा से भरे अश्रु पृथ्वी पर गिरे। उन्हीं अश्रु-बिंदुओं से रुद्राक्ष वृक्ष उत्पन्न हुए। उन वृक्षों पर विभिन्न मुखों वाले रुद्राक्ष उत्पन्न हुए, जिनमें प्रत्येक मुख किसी विशेष देवता और दिव्य शक्ति का प्रतीक माना गया।
अष्टमुखी रुद्राक्ष को भगवान गणेश का स्वरूप माना गया है। कुछ परंपराओं में इसे अष्टमातृका तथा अष्टवसु की शक्तियों का प्रतीक भी माना गया है। इसलिए इसे विघ्नों का नाश करने वाला, बुद्धि देने वाला और सभी कार्यों में सफलता दिलाने वाला रुद्राक्ष कहा गया है।
शास्त्रों में महत्त्व
शिवपुराण में भगवान शिव कहते हैं कि जो श्रद्धापूर्वक रुद्राक्ष धारण करता है, वह पापों से मुक्त होकर शिवकृपा प्राप्त करता है।
अष्टमुखी रुद्राक्ष विशेष रूप से—
- विघ्नों का नाश करता है।
- बुद्धि एवं विवेक बढ़ाता है।
- आध्यात्मिक उन्नति कराता है।
- कर्मों की बाधाएँ दूर करने में सहायक माना जाता है।
- सफलता एवं समृद्धि प्रदान करता है।
अष्टमुखी रुद्राक्ष के लाभ
1. विघ्नों का नाश
भगवान गणेश की कृपा से कार्यों में आने वाली बाधाएँ कम होती हैं।
2. बुद्धि एवं स्मरण शक्ति
विद्यार्थियों, शोधकर्ताओं, लेखकों एवं व्यवसायियों के लिए शुभ माना जाता है।
3. करियर एवं व्यवसाय
नई योजनाओं, व्यापार एवं प्रशासनिक कार्यों में सफलता हेतु लाभकारी माना जाता है।
4. आत्मविश्वास
निर्णय लेने की क्षमता और साहस में वृद्धि का पारंपरिक विश्वास है।
5. आध्यात्मिक उन्नति
ध्यान, जप एवं साधना में मन को स्थिर रखने में सहायक माना जाता है।
6. नकारात्मकता से रक्षा
धार्मिक मान्यता के अनुसार यह नकारात्मक प्रभावों से रक्षा करता है।
किस ग्रह का रुद्राक्ष है?
अष्टमुखी रुद्राक्ष का संबंध मुख्यतः राहु ग्रह से माना जाता है।
यदि जन्मकुंडली में—
- राहु पीड़ित हो,
- राहु महादशा/अंतरदशा में कष्ट हो,
- राहु अशुभ भाव में हो,
- राहु ग्रहण योग या अन्य दोष बना रहा हो,
तो योग्य ज्योतिषीय परामर्श के बाद इसे धारण करने की परंपरा है।
किन दोषों में लाभकारी माना जाता है?
पारंपरिक ज्योतिष के अनुसार यह—
- राहु दोष
- कालसर्प योग से जुड़े कुछ कष्टों
- भ्रम एवं मानसिक अस्थिरता
- कार्यों में बार-बार विघ्न
- आकस्मिक बाधाएँ
में सहायक माना जाता है। ध्यान रहे कि किसी भी दोष का अंतिम निर्णय संपूर्ण कुंडली देखकर ही किया जाता है।
किन राशियों के लिए उपयुक्त?
शास्त्रों में अष्टमुखी रुद्राक्ष को किसी एक राशि तक सीमित नहीं किया गया है। इसे राशि से अधिक कुंडली और ग्रहस्थिति के आधार पर धारण कराया जाता है।
फिर भी पारंपरिक रूप से यह निम्न राशियों के जातकों के लिए, यदि राहु संबंधित कष्ट हों, उपयुक्त माना जाता है—
- मिथुन
- कन्या
- तुला
- मकर
- कुंभ
किन नक्षत्रों में लाभकारी?
राहु के नक्षत्र—
- आर्द्रा
- स्वाती
- शतभिषा
के जातकों के लिए, यदि कुंडली में राहु संबंधित समस्या हो, तो इसे लाभकारी माना जाता है।
धारण करने की विधि
सबसे शुभ दिन—
- बुधवार (गणेशजी का दिन)
- सोमवार
- गणेश चतुर्थी
- संकष्टी चतुर्थी
विधि
- प्रातः स्नान करें।
- रुद्राक्ष को गंगाजल, कच्चे दूध एवं स्वच्छ जल से शुद्ध करें।
- भगवान शिव एवं श्रीगणेश का पूजन करें।
- धूप, दीप एवं पुष्प अर्पित करें।
- निम्न मंत्र का कम से कम 108 बार जप करें—
ॐ गं गणपतये नमः।
इसके बाद—
ॐ ह्रीं हुं नमः। (अष्टमुखी रुद्राक्ष का प्रचलित बीज मंत्र)
या
ॐ नमः शिवाय।
जप करके रुद्राक्ष धारण करें।
धारण करने के नियम
- सदैव श्रद्धा एवं पवित्रता के साथ धारण करें।
- समय-समय पर स्वच्छ जल से साफ करें।
- रसायनों एवं इत्र के सीधे संपर्क से बचाएँ।
- नियमित रूप से “ॐ नमः शिवाय” या “ॐ गं गणपतये नमः” का जप करें।
- यदि विशेष साधना के लिए धारण किया गया हो, तो उसके नियमों का पालन करें।
कौन धारण कर सकता है?
- विद्यार्थी
- व्यापारी
- अधिकारी
- शोधकर्ता
- साधक
- आध्यात्मिक अभ्यास करने वाले
- राहु पीड़ा वाले व्यक्ति (योग्य ज्योतिषीय परामर्श के बाद)
शास्त्रीय निष्कर्ष
अष्टमुखी रुद्राक्ष भगवान गणेश की कृपा, विघ्नों के नाश, बुद्धि, विवेक और सफलता का प्रतीक माना जाता है। शास्त्रों में इसका महत्व रुद्राक्ष धारण की व्यापक परंपरा के अंतर्गत बताया गया है। हालांकि राशि, ग्रह दोष या नक्षत्र के आधार पर रुद्राक्ष धारण करने का निर्णय केवल एक ग्रह देखकर नहीं, बल्कि संपूर्ण जन्मकुंडली का विश्लेषण करके करना अधिक उचित माना जाता है। यही कारण है कि अनुभवी ज्योतिषाचार्य से परामर्श लेकर धारण करना सर्वोत्तम माना जाता है।
ॐ गं गणपतये नमः।
ॐ नमः शिवाय।
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