
भारत में दिव्यता को अनेकों नाम से पुकारा गया है। भगवान शिव के कई नामों में से जो सबसे अधिक प्रसिद्ध है वो है भोलेनाथ के रूप में उनको सम्भोदित किया जाना। इसका अर्थ है वो चेतना जिसमें कोई दोष नहीं है, वो चेतना आनंद स्वरुप है।
प्रसिद्ध कथा के अनुसार: जो सच्चे मन से भगवान शिव की अराधना करता है, भगवान उनसे प्रसन्न हो उन्हें कुछ न कुछ वरदान अवश्य देते हैं। सभी राक्षस गणों ने इस बात का लाभ उठाया और उन्होंने भगवान शिव की अराधना की जिससे वो उनको प्रसन्न कर वरदान प्राप्त कर सकें।
रावण, जो की न सिर्फ एक प्रकांड पंडित था अपितु एक महान योद्धा, प्रशासक भी था। वो भगवान शिव का परम भक्त था। वो राक्षसों के राजा के रूप में जाना जाता था। वह अपने आप से और अपनी शक्तियों से बहुत प्रेम करता था।
स्तोत्र रचने की कहानी शुरू होती है, जब रावण भगवान शिव को अपने साथ लंका ले जाने के लिए कैलास पर्वत को उठाने की कोशिश करता है। भगवान शिव उस समय ध्यानमग्न थे। रावण की इस कोशिश से चारों ओर हाहाकार मच गया। उसने कैलास पर्वत को उठाने के लिए हाथ आगे किये और उसने पर्वत को थोड़ा सा उठाया ही था की भगवान ने अपने पाँव के अंगूठे को धरती पर रख कर उसे थोड़ा सा दबाया। इस प्रक्रिया में रावण के हाथ की उंगलियाँ पर्वत के निचे दब गईं। इस पीड़ा में रावण ने भगवान शिव की स्तुति की और उनका बहुत ही सुंदर वर्णन इस स्तुति में किया। भगवान शिव उसकी स्तुति में तल्लीन हो गए और रावण से बहुत प्रसन्न भी हुए। इस स्तुति को हम “शिव तांडव स्तोत्र” के रूप में जानते हैं।
भगवान शिव रावण से प्रसन्न हुए और उससे वरदान मांगने को कहा। तो रावण ने ने उनसे सबसे शक्तिशाली अस्त्र की मांग की, जिससे कोई भी उसका विनाश न कर सके और वो अविनाशी ही रहे।
गलेवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम् ।
डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं
चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम् ॥ १ ॥
galēvalambya lambitāṁ bhujaṅgatuṅgamālikām |
ḍamaḍḍamaḍḍamaḍḍamanninādavaḍḍamarvayaṁ
cakāra caṇḍatāṇḍavaṁ tanōtu naḥ śivaḥ śivam || 1 ||
विलोलवीचिवल्लरी विराजमानमूर्धनि ।
धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाट पट्टपावके
किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम ॥ २ ॥
vilōlavīcivallarī virājamānamūrdhani |
dhagaddhagaddhagajjvalallalāṭa paṭ-ṭapāvakē
kiśōracandraśēkharē ratiḥ pratikṣaṇaṁ mama || 2 ||
स्फुरद्दिगन्त सन्तति प्रमोद मानमानसे ।
कृपाकटाक्षधोरणी निरुद्ध दुर्धरापदि
क्वचिद्दिगम्बरे मनोविनोदमेतु वस्तुनि ॥ ३ ॥
sphuraddiganta santati pramōda mānamānasē |
kr̥pākaṭākṣadhōraṇī niruddha durdharāpadi
kvaciddigambarē manōvinōdamētu vastuni || 3 ||
कदम्ब कुङ्कुम द्रव प्रलिप्त दिग्वधूमुखे ।
मदान्ध सिन्धुर स्फुरत्त्वगुत्तरीयमेदुरे
मनो विनोदमद्भुतं बिभर्तु भूतभर्तरि ॥ ४ ॥
kadamba kuṅkuma drava pralipta digvadhūmukhē |
madāndha sindhura sphurattvaguttarīyamēdurē
manō vinōdamadbhutaṁ bibhartu bhūtabhartari || 4 ||
प्रसूनधूलि धोरणी विधूसराङ्घ्रि पीठभूः ।
भुजङ्गराजमालया निबद्ध जाटजूटकः
श्रियै चिराय जायतां चकोरबन्धु शेखरः ॥ ५ ॥
prasūnadhūli dhōraṇī vidhūsarāṅghri pīṭhabhūḥ |
bhujaṅgarājamālayā nibaddha jāṭajūṭakaḥ
śriyai cirāya jāyatāṁ cakōrabandhu śēkharaḥ || 5 ||
निपीत पञ्चसायकं नमन्निलिम्पनायकम् ।
सुधामयूखलेखया विराजमान शेखरं
महाकपालि सम्पदे शिरोजटालमस्तु नः ॥ ६ ॥
nipīta pañcasāyakaṁ namannilimpanāyakam |
sudhāmayūkhalēkhayā virājamāna śēkharaṁ
mahākapāli sampadē śirōjaṭālamastu naḥ || 6 ||
-द्धनञ्जयाहुतीकृत प्रचण्ड पञ्चसायके ।
धराधरेन्द्र नन्दिनी कुचाग्र चित्रपत्रक-
-प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने रतिर्मम ॥ ७ ॥
-ddhanañjayāhutīkr̥ta pracaṇḍa pañcasāyakē |
dharādharēndra nandinī kucāgra citrapatraka-
-prakalpanaikaśilpini trilōcanē ratirmama || 7 ||
कुहू निशीथिनी तमः प्रबन्ध बद्ध कन्धरः ।
निलिम्प निर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिन्धुरः
कलानिधान बन्धुरः श्रियं जगद्धुरन्धरः ॥ ८ ॥
kuhū niśīthinī tamaḥ prabandha baddha kandharaḥ |
nilimpa nirjharīdharastanōtu kr̥ttisindhuraḥ
kalānidhāna bandhuraḥ śriyaṁ jagaddhurandharaḥ || 8 ||
-वलम्बि कण्ठ कन्दली रुचि प्रबद्ध कन्धरम् ।
स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं
गजच्छिदान्धकच्छिदं तमन्तकच्छिदं भजे ॥ ९ ॥
-valambi kaṇṭha kandalī ruci prabaddha kandharam |
smaracchidaṁ puracchidaṁ bhavacchidaṁ makhacchidaṁ
gajacchidāndhakacchidaṁ tamantakacchidaṁ bhajē || 9 ||
रसप्रवाह माधुरी विजृम्भणा मधुव्रतम् ।
स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं
गजान्तकान्धकान्तकं तमन्तकान्तकं भजे ॥ १० ॥
rasapravāha mādhurī vijr̥mbhaṇā madhuvratam |
smarāntakaṁ purāntakaṁ bhavāntakaṁ makhāntakaṁ
gajāntakāndhakāntakaṁ tamantakāntakaṁ bhajē || 10 ||
-द्विनिर्गमत् क्रमस्फुरत् कराल फालहव्यवाट् ।
धिमिद्धिमिद्धिमिध्वनन् मृदङ्ग तुङ्ग मङ्गल-
-ध्वनिक्रम प्रवर्तित प्रचण्ड ताण्डवः शिवः ॥ ११ ॥
-dvinirgamat kramasphurat karāla phālahavyavāṭ |
dhimiddhimiddhimidhvanan mr̥daṅga tuṅga maṅgala-
-dhvanikrama pravartita pracaṇḍa tāṇḍavaḥ śivaḥ || 11 ||
-र्गरिष्ठ रत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्ष पक्षयोः ।
तृणारविन्द चक्षुषोः प्रजामही महेन्द्रयोः
समप्रवृत्तिकः कदा सदाशिवं भजाम्यहम् ॥ १२ ॥
-rgariṣṭha ratnalōṣṭhayōḥ suhr̥dvipakṣa pakṣayōḥ |
tr̥ṇāravinda cakṣuṣōḥ prajāmahī mahēndrayōḥ
samapravr̥ttikaḥ kadā sadāśivaṁ bhajāmyaham || 12 ||
विलोल लोललोचनो ललामफाललग्नकः
शिवेति मन्त्रमुच्चरन् कदा सुखी भवाम्यहम् ॥ १३ ॥
vimukta durmatiḥ sadā śirasthamañjaliṁ vahan |
vilōla lōlalōcanō lalāmaphālalagnakaḥ
śivēti mantramuccaran kadā sukhī bhavāmyaham || 13 ||
mahashtsidhikaminijanavahutajalpana
e vimuktavamlochnavivahkalikadhvani
Shiveti mantrabhushana jagajjayay jayatam ॥ 15||
paṭhan smaran bruvannarō viśuddhimēti santatam |
harē gurau subhaktimāśu yāti nānyathā gatiṁ
vimōhanaṁ hi dēhināṁ suśaṅkarasya cintanam || 16 ||
तस्य स्थिरां रथगजेन्द्र तुरङ्गयुक्तां
लक्ष्मीं सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भुः ॥१७॥
yaḥ śambhupūjanaparaṁ paṭhati pradōṣē |
tasya sthirāṁ rathagajēndra turaṅgayuktāṁ
lakṣmīṁ sadaiva sumukhīṁ pradadāti śambhuḥ || 17 ||
शिव तांडव स्त्रोत का पाठ कैसे करें –
शिव तांडव स्तोत्र का पूर्णत: लाभ लेने के लिए इसका विधिवत पाठ करना आवश्यक है –
1. सर्वप्रथम तो अपने आसपास एक शांत और शुद्ध माहौल तैयार करें, जहाँ शोर-शराभा नहीं हो, इसके बाद
आप एक पूजा कक्ष, मंदिर या आपकी प्राथमिकता के अनुसार किसी अन्य स्थान का चयन कर सकते हैं।
2. इसके बाद आप शांतिपूर्वक बैठ जाएं और अपने मन को शुद्ध करें। ध्यान केंद्रित करें और शिवजी का ध्यान करें।
3. अब शिव तांडव स्त्रोत का पाठ करने के लिए अपनी स्वर-तरंग में सुखद और शांत ताल में आरंभ करें। आप इसे अपनी प्राथमिकता और योग्यता के अनुसार स्थानिक भाषा में या संस्कृत में पाठ कर सकते हैं।
4. पूरे स्त्रोत को एकबार में पूरा पढ़ने की कोशिश करें, परंतु यदि आपको पूरी स्त्रोत की लंबाई याद नहीं होती है, तो आप इसे ऊपर दिए गए स्त्रोत को पहले सरल भाषा में याद करे।
5. जब आप स्त्रोत का पठ पूरा कर लें, तो अपने मन में शिवजी का आभार व्यक्त करें और उनसे आशीर्वाद प्राप्त करने की प्रार्थना करें।
6. स्त्रोत पाठ के बाद, आप ध्यान को कुछ समय तक रखें और शांतिपूर्वक ध्यान अवस्था में बने रहें।
शिव तांडव कब पढ़ना चाहिए?
ब्रह्ममुहूर्त के समय, जब सृष्टि की शुरुआत होती है और मन शांत और प्रभावशाली होता है, आप शिव तांडव का पाठ कर सकते हैं। यह आपको एक शक्तिशाली आरंभ देगा और आपकी दिनचर्या में एक आध्यात्मिक दृष्टिकोण जोड़ सकता है।
सूर्यास्त के समय (प्रदोष काल) जब दिन का कार्य समाप्त होता है और शांति की वातावरण बनती है, आप शिव तांडव का पाठ कर सकते हैं। इससे आप दिन के थकान में अपने मन को शांत करके आध्यात्मिक अनुभव को स्थापित कर सकते हैं।
शिव तांडव स्तोत्र के फायदे –
1. शिव तांडव स्तोत्र का पाठ करने से भय से मुक्ति मिलती है, क्योंकि इस तांडव स्तोत्र में भगवान शिव के रूद्र रूप का बखान किया गया है। `
2. यदि आप पर किसी ने तंत्र मंत्र कर रखा हो तो आप नियमित शिव तांडव स्तोत्र का पाठ करके इस समस्या से छुटकारा पा सकते हैं।
3. शिव तांडव स्तोत्र का पाठ करने से मन को शांति और स्थिरता मिलती है। यह मन को ध्यानावस्था में ले जाकर चिंताओं और तनाव से मुक्त करने में मदद करता है।
4. शिव तांडव स्तोत्र के पाठ से आनंद और उत्साह की भावना जागृत होती है और आपकी मनोदशा को सकारात्मकता की ओर प्रवृत्ति करता है।
5. इसका पाठ करने से आप महादेव की उपासना, भक्ति और ध्यान के माध्यम से आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त कर सकते हैं।
चेतावनी
बिना गुरु संरक्षण के कोई भी साधना नहीं करनी चाहिए।
अज्ञानता में की गई साधना मानसिक, शारीरिक और आध्यात्मिक हानि पहुँचा सकती है।
सही मार्गदर्शन और अनुभवी गुरु के निर्देशन में ही साधना करना सुरक्षित और फलदायी होता है।
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