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षट्मुखी रुद्राक्ष (Six Mukhi Rudraksha) सौरभ आचार्य गुरुजी

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षट्मुखी रुद्राक्ष (Six Mukhi Rudraksha) सौरभ आचार्य गुरुजी

 

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षट्मुखी रुद्राक्ष (Six Mukhi Rudraksha)

षट्मुखी रुद्राक्ष भगवान शिव के अश्रुओं से उत्पन्न पवित्र रुद्राक्षों में से एक है। शिवपुराण (रुद्राक्ष महात्म्य), पद्मपुराण, लिंगपुराण, देवीभागवत, तथा रुद्राक्ष-जाबालोपनिषद् में रुद्राक्ष की महिमा का वर्णन मिलता है। यद्यपि प्रत्येक मुखी रुद्राक्ष का विस्तार सभी ग्रंथों में समान रूप से नहीं है, फिर भी पारंपरिक शैव एवं तांत्रिक परंपरा में षट्मुखी रुद्राक्ष का विशेष स्थान माना गया है।


उत्पत्ति की कथा

शिवपुराण के अनुसार त्रिपुरासुर के संहार के पश्चात भगवान शिव ने समस्त प्राणियों के कल्याण हेतु दीर्घकाल तक तप किया। जब उन्होंने अपने नेत्र खोले, तब उनकी करुणा से अश्रु पृथ्वी पर गिरे और उनसे रुद्राक्ष वृक्ष उत्पन्न हुए। इन्हीं वृक्षों के फल से विभिन्न मुखों वाले रुद्राक्ष प्रकट हुए।

षट्मुखी रुद्राक्ष को भगवान कार्तिकेय (स्कन्द, षण्मुख) का स्वरूप माना जाता है। कार्तिकेय के छह मुख ज्ञान, साहस, विवेक, शौर्य, अनुशासन और आध्यात्मिक तेज के प्रतीक हैं। इसी कारण इस रुद्राक्ष को ज्ञान, बुद्धि, आत्मबल एवं नेतृत्व क्षमता प्रदान करने वाला माना जाता है।


शास्त्रीय महत्त्व

शैव परंपरा में षट्मुखी रुद्राक्ष को भगवान कार्तिकेय का प्रतीक माना गया है। यह साधक के भीतर साहस, संयम, विवेक और आत्मविश्वास का विकास करने वाला माना जाता है। कई पारंपरिक ग्रंथों एवं रुद्राक्ष-निबंधों में इसे ब्रह्मचर्य, अध्ययन तथा मानसिक स्थिरता के लिए शुभ बताया गया है।


ज्योतिष के अनुसार

अधिष्ठाता देवता: भगवान कार्तिकेय (स्कन्द)

अधिपति ग्रह: शुक्र (Venus)

यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में शुक्र कमजोर, नीच, पापग्रहों से पीड़ित या अशुभ फल दे रहा हो, तो योग्य ज्योतिषीय परामर्श के बाद षट्मुखी रुद्राक्ष धारण करना लाभकारी माना जाता है।


किन राशियों के लिए लाभकारी?

परंपरागत मान्यता के अनुसार यह विशेष रूप से लाभकारी माना जाता है—

  • वृषभ (Taurus)
  • तुला (Libra)

साथ ही जिनकी कुंडली में शुक्र महत्वपूर्ण भूमिका निभाता हो, वे भी योग्य परामर्श के बाद इसे धारण कर सकते हैं। केवल राशि के आधार पर रुद्राक्ष धारण करने के बजाय जन्मकुंडली का विश्लेषण अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है।


किन नक्षत्रों के लिए?

चूँकि इसका संबंध शुक्र ग्रह से माना जाता है, इसलिए परंपरागत रूप से शुक्र के नक्षत्रों से जुड़े जातकों के लिए इसे शुभ माना जाता है—

  • भरणी
  • पूर्वाफाल्गुनी
  • पूर्वाषाढ़ा

फिर भी अंतिम निर्णय जन्मकुंडली के आधार पर ही लेना चाहिए।


किन दोषों में सहायक माना जाता है?

परंपरागत ज्योतिषीय मान्यता के अनुसार यह रुद्राक्ष—

  • शुक्र दोष
  • वैवाहिक जीवन की कुछ समस्याओं
  • दाम्पत्य असंतुलन
  • भोग-विलास में असंयम
  • आत्मविश्वास की कमी
  • मानसिक अस्थिरता
  • शिक्षा में एकाग्रता की कमी

में सहायक माना जाता है। यह ग्रहदोषों का पूर्ण विकल्प नहीं, बल्कि आध्यात्मिक सहायक साधन माना जाता है।


प्रमुख लाभ

आध्यात्मिक लाभ

  • भगवान कार्तिकेय की कृपा प्राप्त होती है।
  • साधना में एकाग्रता बढ़ती है।
  • आत्मविश्वास और आत्मबल में वृद्धि होती है।
  • आध्यात्मिक उन्नति में सहायक माना जाता है।

मानसिक लाभ

  • मानसिक चंचलता कम करने में सहायक।
  • निर्णय लेने की क्षमता बढ़ाने में सहायक।
  • स्मरण शक्ति एवं एकाग्रता में लाभकारी माना जाता है।

सामाजिक एवं व्यावहारिक लाभ

  • नेतृत्व क्षमता का विकास।
  • व्यक्तित्व में आकर्षण।
  • संवाद कौशल में सुधार।
  • आत्मअनुशासन में वृद्धि।

धारण करने की विधि

शुभ दिन

  • सोमवार
  • शुक्रवार
  • स्कन्द षष्ठी
  • शुक्ल पक्ष

विधि

  1. प्रातः स्नान करें।
  2. रुद्राक्ष को गंगाजल एवं कच्चे दूध से शुद्ध करें।
  3. भगवान शिव एवं कार्तिकेय का पूजन करें।
  4. धूप, दीप एवं पुष्प अर्पित करें।
  5. निम्न मंत्रों में से किसी एक का 108 बार जप करें—

ॐ नमः शिवाय

या

ॐ षण्मुखाय नमः

या

ॐ स्कन्दाय नमः

इसके बाद रुद्राक्ष को धारण करें।


धारण करने के नियम

  • श्रद्धा एवं पवित्रता का पालन करें।
  • नियमित रूप से “ॐ नमः शिवाय” का जप करें।
  • रुद्राक्ष को साफ एवं शुष्क रखें।
  • समय-समय पर प्राकृतिक तेल से हल्का अभिषेक कर सकते हैं ताकि दाना सूखे नहीं।
  • किसी अन्य व्यक्ति को अपनी रुद्राक्ष माला पहनने के लिए न दें।

क्या महिलाएँ धारण कर सकती हैं?

हाँ। शास्त्रों में महिलाओं के लिए रुद्राक्ष धारण करने का सामान्य निषेध नहीं है। स्वच्छता, श्रद्धा और उचित आचरण के साथ स्त्री एवं पुरुष दोनों इसे धारण कर सकते हैं।


कौन धारण न करे?

सामान्यतः रुद्राक्ष सभी श्रद्धालु धारण कर सकते हैं। किन्तु यदि किसी विशेष तांत्रिक साधना, संप्रदाय या गुरु द्वारा अलग नियम दिए गए हों, तो उन्हीं का पालन करना चाहिए।


निष्कर्ष

षट्मुखी रुद्राक्ष भगवान कार्तिकेय का प्रतीक माना जाता है और पारंपरिक मान्यता के अनुसार शुक्र ग्रह से संबंधित शुभ फल प्रदान करने वाला है। इसे ज्ञान, साहस, आत्मविश्वास, नेतृत्व क्षमता, मानसिक संतुलन तथा आध्यात्मिक उन्नति के लिए लाभकारी माना जाता है। हालांकि किसी भी रुद्राक्ष को ग्रहदोष निवारण का एकमात्र उपाय नहीं माना जाता; सर्वोत्तम परिणाम के लिए इसे योग्य गुरु या अनुभवी ज्योतिषाचार्य के मार्गदर्शन में, जन्मकुंडली के विश्लेषण के बाद धारण करना उचित माना जाता है।

मंत्र:
ॐ षण्मुखाय नमः।
ॐ स्कन्दाय नमः।
ॐ नमः शिवाय।

हर हर महादेव। 🙏

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